ग्रंथ अरदास बत्तीसी

 

|। राम |



|। ग्रंथ अरदास बत्तीसी|

* स्तुति वचन *

 

नमो राम गुरुदेवजी, जन त्रिकाल के वन्द।

विघ्न हरण मंगल करण, रामदास आनन्द।।

 

*  दोहा *

दीनबन्धु अशरणशरण, करुणा सागर राम ।

सदा संगाती जीव के, द्यालबाल परणाम।।1।।

 

करुणासागर रामजी, कहत दयाके नाथ।

अबलों विरद पूरो कर्यों, हम बिलखत दिनरात।।2

 

करमां के रक्षक भये, जीवां रक्षक नांहिं।

आप आसरे रामजी, हमको लीयां जांहिं।॥3।।

 

मो कर्मनकी झोंपड़ी, दया पठाई जेथ।

पैदाकर न्यारे भये, ओ कैसो अब हेत।।4॥


कुण ऊरबो रंकको, भूपति करे न कान।

साधू वचन मुनिवर ग्रन्थ, उलट करो आख्यान।।5।।


यो जिव दीन अनाथको, कर्म महाबलवान।

राम गरीब - निवाज हो, ओ कैसो वर्तमान।।6॥


कूक सुणी मो कर्मकी, महरवान महाराज।

शरणपणो प्रतिपालणों, छोड़दियो तुम आज।।7।।

 

मैं अजहूँ नाँहीं सुन्यो, शरणेतणों विगाड़।

रामदास शरणागती, रामरक्षाकी बाड़।।8॥

 

स्याय करो कर्मां दिशी अकरण करण दयाल।

जीवाँ प्रतिपालण तज्यो, मो मन भलां विहाल।।9।।

  

यह शोभा जग में कवन, देकर फिर उरलेत।

हरिसो दाता को नहीं, सब मोपर नेत।।10।।

 

व्याधि लगी ऐंचत नयन, वयन हरीजन जाय।

मेरो यहाँ जावत कहा, तेरो विरद लजाय।।11।।


घटिये को घटसी कहा,तुम नहिं करो उबेल।

धणीपणों पूरो भयो, यह कर्मनको खेल।।12।।

 

प्राप्त हुए सो पायगा, तो कहा निवाजो राम।

तुम हो दाता मोक्ष के, सुखकारण सुखधाम।।13।।

 

इन वपूरेकी क्या गमी, सदा जीव की लाज।

समर्थपणो ईश्वरकला, कहा करसो महाराज।।14।।

 

शरण तुम्हारी रामजी, आनन्द अगम अपार।

आधि व्याधि मोपर लगी, ओ कैसो अनुसार।।15।।

 

यों करतां जासी नयन, वयन समासी केत।

विरद वधारण रामजी, पिता पूत्र पर नेत।।16।।


जोरावर जालिम दुस्सह, वैरी लागा मोय।

राम अरज मानी नहीं, तो कैसी गति होय।।17।।


और दिशा दीसे नहीं, जिनसे करूँ पुकार।

करुणासागर रामजी, कीजे वेग संभार।।18।।


सर्व प्रकाशी रामजी, असंख्य सूर परकाश।

घटबिच अघटा ज्योति तव, कतविध चखको नाश।।19।।


मो लायक सारी सजा, तो लायक यह नाहिं।

लायक पायक शरण सूख, गायक ग्रन्थां मांहिं।।20।।


यह अरदासहि जंपना, राम बड़ो विश्वास ।

अबकी वेर उबेल अब, इण मोसर इण श्वास ।।21।।


औषधि वैद हकीम सिध, कारीगर करतार।

आश वास विश्वास सत, एकाएक अधार ।।22।।

 

अंतरजामी अंतर की, जानत हो महाराज।

जतन जाबतो रामजी, द्यालबाल की लाज।।23।।


हार्या का भीड़ी भया, आगे भारत मांय।

मन वच क्रम अरदासता, दीजे बन्ध छुड़ाय।।24।।


बन्ध छुड़ावण रामजी, आद अन्त के माहिं।

सन्त साख तारण तरण, कारण करण सदाहिं।।25।।


प्राण पिंड सूरत अजब, कर्ता आप दयाल।

तुमते कौन जोरावरी,खंडन करण कुचाल।।26।।


सूर अग्र रजनी कहाँ,हुत आगे कहां घास।

मो मन निज विश्वास यह, रामशरण अघ नाश ।।27।।


पतितां पावन रामजी, सुणज्यो यह अरदास।

द्यालबाल आतुर अधिक, वस्यो रावरे वास ।।28।।


आणवणी मोटा धणी, घणी भई जिव मांय।

समरथ सब दुख भंजना, नमो नमो हरि राय।।29।।


हम सम नहिं अनाथ को, तुम सम कोइ न नाथ।

आप विनां मुरलोक में, कुण पूछे कुशलात ।।30।।


रामदास महाराज को, खानाजाद गुलाम ।

प्रतिज्ञा राखण नमो, श्वास श्वास विश्राम ।।31।।


शिशु रोवन को जोर है, यह अरदास बतीस।

द्यालबाल के प्राणपति, जग जामी जगदीश।।32।।


!!इति श्री ग्रंथ अरदास बत्तीसी !!

 

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