सन्ध्या वन्दन (आरती)

 

सन्ध्या वन्दन (आरती)

(1)

ऐसी आरती घट ही में कीजे, राम रसायण निशदिन पीजै ।।टेर॥

घट ही में देवल घट ही में देवा, घट ही में सहज करे मन सेवा ।।1।।

घट ही में पांच पचीसुं पंडा, घट ही में जागे जोत अखण्डा ।।2।।

घट ही में पाती फूल चढ़ावै, घट ही में आतम देव मनावै।।3।।

घट ही में शंख शब्द घन तूरा, घट ही में प्रेम परस निज नूरा ।।4।।

घट ही में गावै हरि का दासा, घट ही में पावै पद परकासा।।5।।

जन हरिराम राम घट मांही, बिना खोज्यां कोइ पावत नांही ।।6।।

 

(2)

आरती करूं गुरु हरिराम देवा, ब्रह्म विलास अगम घर भेवा।

आए संत ब्रह्म व्योपारी, राम नाम विणजै बह भारी।। टेर।।

ज्ञान ध्यान अनुभव अनरागी, रूंम रूंम में झालर वागी।।1।।

इला पींगला सुखमण भोगी अटल अमर अणभै पद जोगी।।2।।

शील संतोष सांच सत धारी, सता समाधि शुन्य से यारी।।3।।

आय रामियो शरण तुम्हारी, पल-पल ऊपर प्राण अंवारी।॥4।।

(3)

निजमन भाव आरती सारी, श्री गुरु रामदास बलिहारी।। टेर।।

सत्तगुरु ज्ञान ध्यान की मूरत, सतगुरु समी अवर नहिं सूरत।।1।।

विष्णु ब्रह्मा शिव सतगुरु माई, अनत कोटि जन परचै सांई।।2॥

दीनदयाल जीवों के तारग, सतगुरु मोक्ष मुक्ति के मारग।।3॥

बारमबार करू परणामा, परमधाम आनन्द विश्रामा।।4।।

अष्ट विधान आरती षोडस, द्यालबाल के मस्तक मोड़स।।5।।

(4)

आरती करू गुरुदेव निरजन, सुरगुण रूप धरे जन अंजन ।।टेर।।

धर अवतार केता जिव तारे, आयां शरण सबै अघ जारे ।।1।।

काल जंजाल जुरा डर नांही, निर्भय निजानन्द पद मांही।।2।।

जै जै जै जयमल के नन्दन, हृरिराम रामा धिन वन्दन ।।3।।

द्यालबाल सतगुरु परणामा, पूरणदास लिया विश्रामा।।4।।

 

(5)

ऐसी आरती करो मन ज्ञानी, पलक न विसरू सारंग पाणी।॥।टेर॥

पांच पचीस का करो विचारा, जा विच आतम राम पियारा।।1॥

प्रेम को तेल सुरत की बाती, ब्रह्म की जोति जगै दिन राती।।2॥

आरति गुरू गोविन्दजी की करिये, कहै कबीर भवसागर तरिये।।3॥

 

(6)

आरति करू पतिदेव मुरारी, चंवर डुलै बलि जाउं तुम्हारी ।।टेर॥

चहुँदिश आरति चहुँदिश पूजा, चहुँदिश राम मेरे और न दूजा।।1।।

आरती कीजै प्रीति लगाई जनम जनम का पातक जाई ।।2।।

आरति कीजै ऐसे तैसे, धुव प्रहलाद करी शुक जैसे।।3।।

आनन्द आरती आतम पूजा, नामदैव भणै मेरे देव न दूजा।। 4।।

 

सन्ध्या स्तुति पाठ

-:: साखी ::-

 

परब्रह्म सतगुरु प्रणम्य पुनि सब सन्त नमोय ।

हरिरामा मुरभवन में, या पद समा न कोय ।।1।।


प्रथम सेव गुरुदेव की, पीछे हरि की सेव ।

जन हरिया गुरुदेव बिन, भक्ति न उपजै भेव ॥2।।


गुरु सेवा के राम की, या तुल नांही और ।

गुरु तो भांजे भरम कूं, राम मुगत की ठोर ॥3।।


पहली दाता हरि भया, जिनतें पाई जिन्द ।

पीछे दाता गुरु भया, तिन दाखे गोविन्द।।4॥


सतगुरु सेती वीनती, परब्रह्म सूं परणाम ।

अनत कोटि सन्त रामदास, निश दिन करू सिलाम ।।5।।


अटल वैण गुरुदेव का, रामदास सत मांन ।

एता पूठा नां फिरै, गिरिवर गंग गिनांन ॥6


गिरी मेरू अरु गंग की, या हृद ऊली बात।

रामदास गुरुशबद तें, मिलै निरंजण नाथ ।।7॥


नमो राम गुरुदेवजी, जन त्रिकाल के वन्द।

विघन हरण मंगल करण, रामदास आनन्द ॥8


जै जै जैमलदास गुरु, नमो नमो हरिराम ।

रामदास पद कंज रज, द्यालबाल विश्राम ।।9


उनमंता अवगत रता, सुमरन्ता निज नाम ।

शीतलता दिव्य दुष्टिता, नमो सन्त हरिराम ।। 10


हृरिरामा राम नमो, द्यालबाल मुझ स्वाम।

मन वच क्रम करियै सदा, पूरण ताहि प्रणाम ।।11।।


श्री हरिगुरु हरिराम धिन, रामदास मुझ स्या

द्याल पुरुष पूरण प्रती, अर्जुन की परणाम ।।12॥

 

:: छप्पुय छंद ::

 

प्रथम कर परणाम, रामदासं गुरु स्वामी।

दूसर श्री गुरु द्याल, अनन्त जीवां हंस नामी।।13॥


तीसर श्री गुरुदेव, ब्रह्म पूरण भरपूरा।

वाणी विमल रसांल, भरम करम चकचूरा ।।14॥


सनध्या मध्य प्रभात रट, जीव परमपद पाय है।

अर्जुनदास जु रावरे, चरण कमल चित लाय है॥15।।

 

-:: साखी ::-

 

नमस्कार कर जोड़ के, रामदास धिन द्याल।

पूरण अर्जुन गुरु प्रती, विनय करे हरलाल ।।16॥


कबीर प्रणवत गुरु गोविन्द कूं, अब जन वन्दूं सोय ।

पहल भये परणाम ता, नमो स आगे होय ।।17॥


-:: सोरठा ::-

 

अभ्यन्तर नहिं भाव, नाम कहै हरि नाम सुं।

नीर विहूणी नाव, क्योंकर तरियै केशवा ।।18॥

-:: साखी ::-

 

हरि सा हीरा छाँड के, करे आन की आश।

ते नर जमपुर जावसी, सत भाखै रैदास ।।19।।


भगत कहा जोगी जती, षट दर्शन विश्राम।

जगन्नाथ जगदीश कूं, भजै ताहि परणाम ।।20।।


गुरु कूं पूजै गुरुमुखी, बाना पूजै साद ।

षड्दर्शन कूं पूजै कूबजी, जा का मता अघाद ।।21॥


षड्दर्शन अरु खलक की, रहणी दुआ दुलभ्भ ।

रज्जब रहसी असंग जुग, कीरत रूपियो खम्भ ।।22।।


दया धरम को रूंखड़ो, सत सूं वदतो जाय।

सन्तोष से फूलै फळै, दादू अमर फल खाय ।।23।।


मीठा बोलण निंव चलण, पर औगण ढक लेण।

पांचूं चंगा नानगा, हरि भज हाथाँ देण।।24।।


ज्ञान गरीबी गुरु धरम, नरम वचन निर्दोष।

तुलसी एता राखियै, सरदा शील सन्तोष ।।25।।


जग में वैरी को नहीं, सब सैणां को साथ।

केवल कूबो यूं कहै, चरण निवाऊं माथ ॥26॥

 

 

-: आचार्य कीर्तन : -

श्री राम नमो गुरू द्याल नमो।

पूरण अर्जुन हरलाल नमो।।

श्री लाल गुरू केवलराम नमो।

सुखधाम हरी गुरुधाम नमो।।


करुणासागर ग्रंथ क्या है ? 

 

 अथ ब्रह्म स्तुतीं


अथ रक्षा बत्तीसी


ग्रंथ अरदास बत्तीसी


श्री गुरु वन्दन स्तोत्र


सन्ध्या वन्दन (आरती)


रामस्नेही संप्रदाय खेड़ापा के आचार्य।रामस्नेही संप्रदाय खेड़ापा के महाराज।रामस्नेही संप्रदाय खेड़ापा के गुरु।

 

ग्रन्थ करुणा सागर


श्री हनुमान चालीसा – Shree Hanuman Chalisa


भोजन मंत्र – Bhojan Mantra


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