भोजन मंत्र - Bhojan Mantra
भोजन मंत्र - Bhojan Mantra
।।श्री।।
भोजन पूर्व उच्चारणीय
मंत्र
ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्
ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन
गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना।।
(गीता)अर्थ- यज्ञ
में आहुति देने के साधन ( स्त्रुक-स्त्रुवा हाथ की मृर्गि -हंस-व्याघ्र आदि
मुद्रायें) अर्पण भी ब्रह्म है, हवन करने का पदार्थ हवि भी ब्रह्म है, ब्रहमरूपी अग्रि में
ब्रह्मरूप होमकर्ता द्वारा जो हवन किया गया, वह भी ब्रह्म है। अतः ब्रह्मरूप कर्म में समाधिस्थ पुरुष के
द्वारा जो प्राप्त होने योग्य है वह ब्रह्म ही है।
ॐ सहनाववतु। सहनौ
भुनक्तु। सहवीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै॥
ॐ शान्ति:
शान्ति: शान्ति:॥
(कृष्ण यजुर्वेद उपनिषद्)
अर्थ- हम दोनों (गुरु और
अन्तेवासी शिष्य) परस्पर मिलकरसुरक्षा कें। हम मिलकर भोग करें (देश में कोई भूखा न
रहे)। हमसाथ-साथ मिलकर शौर्य करें (राष्ट्र में परचक्र आने पर युद्ध करे)।हम (देश
के संगठन रूपी तपश्चर्या से) उज्ज्वल एवं प्रदीप्त हों।हमारा अध्ययन तेजस्वी हो।
परस्पर द्वेष न करें तो त्रिविध तापों (आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक) से शान्ति प्राप्त हो।
।। ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ।।
ॐ अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकरप्राणवल्लभे।
ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति।।
अर्थ- हे सदा पूर्ण रहने वाली, भगवान शिव की
प्राणप्रिय पत्नी माँ अन्नपूर्णा, मुझे ज्ञान और
वैराग्य की प्राप्ति के लिए भिक्षा (भोजन) प्रदान करें। हे पार्वती, आप मेरी माँ हैं और भगवान शिव मेरे पिता हैं।

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