ग्रन्थ करुणा सागर

 

।। श्री रामो वर्वर्ति सर्वोपरि  ।।



卍 ग्रन्थ करुणा सागर 卍

स्तुति वचन

नमो राम गुरुदेवजी, जन त्रिकाल के वन्द ।

विघ्न हरण मंगल करण, रामदास आनन्द।।


।। दोहा ।।


राम गरीबनिवाज को, मोहि बङो विश्वास ।

जगजामी पालण जगत, सब कि पूरै आस ।।1।।


शरणाई पिंजर विजय, ऐसा समरथ साम ।

दीनबंधु आनन्दता, परमेश्वर परणाम ।।2।।


हूं वन्दूं जाकुँ सदा, सबकी सुणै पुकार ।

अज्ज कीट पर्यन्त लोँ, भयभंजन भरतार ।।3।।


निर्बल दुखित अराधियो, प्रगट्यो तहँ परमेस ।

वृध्दा तरुणा भेद नहिँ, कहा ध्रुव बालक वेस ।।4।।

।। छंद सारसी ।।


ध्रव वन सिधार्यो वचन मार्यो ध्यान धार्यो एक ये ।

तजि पान नीरू महाधीरू परा पीरू पेख ये ।

सब ब्रह्म मंजू उरस मंजू सुरत रंजू ताम ये ।

ऐसा गोविंदू कृपासिंधू दीनबंधू राम ये ।

जी दीनबंधू राम ये ।।5।।


खुल्ले कपाटू विकट घाटू पवन वाटू थक्क ये ।

डुल्ले विराटू शोक काटू भक्त ठाटू शक्क ये ।

षट् मास माँई मिले साँई अचल पाँई धाम ये ।

ऐसा गोविंदू कृपासिंधू दीनबंधू राम ये ।

जी दीनबंधू राम ये ।।6।।


प्रहलाद गायो असुर दाह्यो बहु रिसायो मार ये।

सर्पां खवायो विष्ष पायो गिरि गुरायो जार ये।

हाथी चुवायो सिंधु बुहायो जहाँ जिवायो नाम ये।

ऐसा गोविंदू कृपासिंधू दीनबंधू राम ये ।

जी दीनबंधू राम ये।।7।।


कोपे करालू अंध जालू बंध बालू बोल ये।

सबमें गोपालू है दयालू मारडालू कोल ये।

थंभे विचालू तत्तकालू विरदवालू आम ये।

ऐसा गोविंदू कृपासिंधू दीनबंधू राम ये ।

जी दीनबंधू राम ये ।।8।।


नक्खां विदारे उदरफारे असुर मारे आप ये।

भक्ती वधारे संत सारे दुःख म्हारे काप ये।

केतांन तारे यों उबारे सर्व थारे काम ये।

ऐसा गोविंदू कृपासिंधू दीनबंधू राम ये ।

जी दीनबंधू राम ये।।9


देखो अरुण पंगू गिरि उलंगू मनी मंगू सिद्ध ये।

करना सरक्खू किये नक्खू दीन अक्खू तहद ये।

इक गिद्ध गाधू किये साधू दीध आदू धाम ये।

ऐसा गोविंदू कृपासिंधू दीनबंधू राम ये ।

जी दीनबंधू राम ये।।10।।


शबरी सदाई भक्ति भाई ऋषि नँवाई शीस ये।

शिल्ला तिराई नारि थाई नाव माँई बीस ये।

सूवा पढ़ाई पाप दाई गती वाई पाम ये।

ऐसा गोविंदू कृपासिंधू दीनबंधू राम ये ।

जी दीनबंधू राम ये।।11।।


इक असुर बइयूँ शरण लइयूँ चिंरजइयूँ भाख ये।

ता-सुक्ख दइयूँ मोख भइयूँ दोष नइयूँ साख ये।

भृत कीश कइयूँ भालू सइयूँ प्रीति पइयूँ जाम ये।

ऐसा गोविंदू कृपासिंधू दीनबंधू राम ये ।

जी दीनबंधू राम ये।।12।।


दुष्टी अशन्नू वेद छिन्नू बहु रुदन्नू अज्ज ये ।

हा हा विषन्नू हुय प्रसनू धारि तन्नू कज्ज ये।

मच्छा हयग्रीवूँ भक्ति सीवूँ निगम कीवूँ ठाम ये।

ऐसा गोविंदू कृपासिंधू दीनबंधू राम ये ।

जी दीनबंधू राम ये ।।13।।


वरदान पाए शिव रिझाए भस्म भाए विक्करू।

महा कष्ट पाए ऊठ धाए दीन थाए शंकरू।

शिवा सवाए आप आए हत्यो ताए छाम ये।

ऐसा गोविंदू कृपासिंधू दीनबंधू राम ये ।

जी दीनबंधू राम ये ।।14।।


क्रीड़ा समंदू गज्ज अंदू ग्राह फंदू रच्च ये।

करष्यो गयंदू डूब जिंदू शूंड मंदू सच्च ये।

ररो कहंदू हरि हरंदू मेट द्वंदू ब्राम ये।

ऐसा गोविंदू कृपासिंधू दीनबंधू राम ये ।

जी दीनबंधू राम ये ।। 15


द्विज भयो वेलू अजामेलू कामकेलू बाम ये।

जमदूत खेलू काल बेलू कंठ मेलू घ्राम ये।

सुतहेत हेलू नाम लेलू कर उबेलू साम ये।

ऐसा गोविंदू कृपासिंधू दीनबंधू राम ये ।

जी दीनबंधू राम ये ।।16।।


लाखा गृहाए जालदाए पांडु मांए राख ये।

द्रोही खपाए समर साए विजयताए भाख ये।

दोषण मिटाए पुराण गाए सखा स्वाए भाम ये।

ऐसा गोविंदू कृपासिंधू दीनबंधू राम ये ।

जी दीनबंधू राम ये ।।17।।


सभ्भा मँझारी दुष्ट ख्वारी कर उघारी काज ये।

हा हा पुकारी पांडु नारी लाज म्हारी आज ये।

अम्बर वधारी प्रीति पारी कष्ट टारी बाम ये।

ऐसा गोविंदू कृपासिंधू दीनबंधू राम ये ।

जी दीनबंधू राम ये ।।18।।


इक द्विज्ज दीनू रोरभीनू प्रीति कीनू कान ये।

मन वांछ लीनू पुर नवीनू अभय दीनू दान ये ।

धिन सुरतदेवूं भक्तिभेवू सिद्ध सेवूं काम ये।

ऐसा गोविंदू कृपासिंधू दीनबंधू राम ये ।

जी दीनबंधू राम ये ।।19।।


विद्दुर सदाई प्रेममांई भक्तिभाई शुद्ध ये।

छिलका खवाई वाह लुगाई प्रसनताई तद्द ये।

राजा भुँजाई तजी साँई यहाँ न लाई दाम ये।

ऐसा गोविंदू कृपासिंधू दीनबंधू राम ये ।

जी दीनबंधू राम ये ।।20।।


भीषम सखत्तु अडिग मत्तू गही अत्तू राख ये।

आयुद्ध हत्तू भक्तपत्तू दर्शदत्तू पाख ये।

मेले मुकत्तू रामरत्तू गोपगत्तू गाम ये।

ऐसा गोविंदू कृपासिंधू दीनबंधू राम ये ।

जी दीनबंधू राम ये ।।21।।


आँवान झालू अस्सरालू बीच बालू मिन्नये।

राख्या दयालू मृग्गबालू अरी कालू हन्न ये।

खेचर करालू समर जालू रखे बालू जाम ये।

ऐसा गोविंदू कृपासिंधू दीनबंधू राम ये ।

जी दीनबंधू राम ये ।।22।।


आरत्ति हरणू अभय करणू नमो शरणू सत्त ये।

ऐसा अकरणू अतिरतिरणू वेद वरणू नित्त ये।

हम व्याधि जरणू धरा धरणू वचन फुरणू काम ये।

ऐसा गोविंदू कृपासिंधू दीनबंधू राम ये ।

जी दीनबंधू राम ये ।।23।। 


नमो नमामी अँतर्यामी सर्व स्वामी सृष्ट ये।

वन्दों सदाई सुख्खदाई चित्त आई इष्ट ये।

अन्नाथनाथाँ सदा साथाँ तोहि हाथाँ हाम ये।

ऐसा गोविंदू कृपासिंधू दीनबंधू राम ये ।

जी दीनबंधू राम ये ।।24।।


* !! दोहा !! *


जैसे सूतर पूतली, चित्रकार चित्राम।

मैं अनाथ एसे सदा, तुम इच्छा सोइ राम ।।25।।


खलखायक सायक जनां, दीनबंधु देवाधि।

द्यालबाल शरणागती, तुमसे पति हम व्याधि ।।26।।


स्यायक विश्वावीश हरि, गायक वेद पुरान।

लायक पायक शरणसुख, यह तव नीति निधान ।।27।।

 

जुग सदा योही आसरो, तुम रक्षक महाराज।

तारण विरद अनादि तव, यह मेरो अब काज ।।28।।

।। छंद सारसी ।।


काज मेरो तुम्हें चेरो मेटि झेरो दरद ये।

करिहैं न हेरो शरण केरो सदा तेरो विरद ये।

नामा न घेरो सदन फेरो गउ उबेरो साज ये।

भक्ती वधारू विरद वारू संत सारू काज ये।

जी संत सारू काज ये ।।29।।


जमुना गहीरू झड़ जँजीरू झाल खीरू नां जले ।

बालद वहीरू धर शरीरू नीर नीरू हरि मिले।

निर्भय कबीरू ब्रह्म धीरू शब्दशीरू गाज ये।

भक्ती वधारू विरद वारू संत सारू काज ये।

जी संत सारू काज ये ।।30।।

 

कोपे दुर्वासा अहू ख्वासा हतूं दासा राज ये।

सूदर्श जासा प्राण ग्रासा कंप व्यासा भाज ये।

मुरदेव पासा भई हासा जन निवासा वाज ये ।

भक्ती वधारू विरद वारू संत सारू काज ये।

जी संत सारू काज ये ।।31।।


करि यज्ञ राजू ऋषि समाजू, वेद गाजू गाव ये ।

नहिं शंख वाजू पंडवकाजू संतराजू आव ये ।

ले पंच क्वाजू भई वाजू भ्रम्म भाजू राज ये।

भक्ती वधारू विरद वारू संत सारू काज ये।

जी संत सारू काज ये ।।32।।


प्रतिमा बुलाई साँच पाई गंग आई भवन ये।

तन में दिखाई नौगुणाई जर्द साई सबन ये।

रैदास सांई देह थाँई जीम जाँई ब्राज ये।

भक्ती वधारू विरद वारू संत सारू काज ये।

जी संत सारू काज ये ।।33।।


पीपा समर्तू अगम गत्तू भक्त चरित्तू नैक ये ।

इच्छा फिरत्तू सोई सत्तू आप रत्तू एक ये ।

मृगराज कामी शिष्य स्वामी मुक्तिगामी जाज ये ।

भक्ती वधारू विरद वारू संत सारू काज ये।

जी संत सारू काज ये ।।34।।


गायाँ चराई भातखाई रामराई रम्म ये।

खेती निपाई पात्र मांई विनाँ वाई शम्म ये।

धन्नो धनाई प्रभूताई जनां गाई छाज ये।

भक्ती वधारू विरद वारू संत सारू काज ये।

जी संत सारू काज ये ।।35।।


सूतर खडग्गू सार नग्गू जन प्रतग्गू राख ये।

कर माग दग्गू जिये जग्गू दुष्ट अग्गू खाख ये।

फिर अश्व अग्गू चढे सग्गू समर लग्गू बाज ये।

भक्ती वधारू विरद वारू संत सारू काज ये।

जी संत सारू काज ये ।।36।।


नृप दुष्ट खख्खी गरल दख्खी इष्ट पख्खी सो लये।

धिन प्रेम छक्की राम रख्खी निर्भै थक्की बोलये।

मीरां सरख्खी गोपि अख्खी जगत नख्खी लाजये।

भक्ती वधारू विरद वारू संत सारू काज ये।

जी संत सारू काज ये ।।37।।


हूँडी माहेरो करि घणरो सुतन केरो व्याव ये।

सभ्भा मॅँझारी भूप नारी लियाँ झारी आव ये।

नरसी सदारी माल थारी नीर प्यारी पाज ये।

भक्ती वधारू विरद वारू संत सारू काज ये।

जी संत सारू काज ये ।।38।।


हाथी चुवाए पर्यो पाए असुर थाए दास ये।

पाती फिराए दरश धाए साँच आए जास ये।

दादू दयालू हुय कृपालू जीव जालू भाज ये।

भक्ती वधारू विरद वारू संत सारू काज ये।

जी संत सारू काज ये ।।39।।


वाली सवाई तुले ताई प्रीति भाई दास ये।

भैस्याँ मँगाई और थाई ब्याज माँई छाँस ये।

बलदाँ जिसाई जसू वाँई राम राई न्वाजये।

भक्ती वधारू विरद वारू संत सारू काज ये।

जी संत सारू काज ये ।।40।।


जग नृप्प वादू कोन सादू मिट म्रजादू काड ये।

जन कह्यो आदू राम सादू इच्छा तादू छाड ये।

कुण देश माया झूठ काया रामराया राज ये।

भक्ती वधारू विरद वारू संत सारू काज ये।

जी संत सारू काज ये ।।41।।


इच्छा पुरारी शीश धारी है मुरारी साथ ये।

राखो जहाँरी सींव थाँरी मैं' न म्हारी नाथ ये।

कुण बलाकारी गर्वहारी अकल वारी गाज ये।

भक्ती वधारू विरद वारू संत सारू काज ये।

जी संत सारू काज ये ।।42।।

 

तपस्या ठकुराई छीन थाई मिट दुहाई देश ये।

चाकर दुजाई पाप मांई सुद्ध आई वेस ये।

करुणा बढाई पुनि बुलाई जन सहाई आज ये ।

भक्ती वधारू विरद वारू संत सारू काज ये।

जी संत सारू काज ये ।।43।।


सन्ताँ सहाई राम राई, सदा आई प्रत्तये।

सम्रथ सदाई रख्या मांई कौन ताई द्रुत्त ये।

मुरलोक माँई गँज न जाई प्राणि भाई माज ये।

भक्ती वधारू विरद वारू संत सारू काज ये।

जी संत सारू काज ये ।।44।।


कहा देश देशू रम प्रदेसू है प्रमेसू संग ये।

दुष्टी विचेसू करि अनेसू खोस लेसू कंग ये।

सोई मरेसू जन निर्भसू सुखावेसू आज ये।

भक्ती वधारू विरद वारू संत सारू काज ये।

जी संत सारू काज ये ।।45।।

 

कहा घाट वाटू सुख्ख ठाटू मुज वैराटू राम ये ।

गुरु रामदासू चरित गासू नित निवासू नाम ये ।

लज्जा सदासू आदि आसू कली कासू राज ये।

भक्ती वधारू विरद वारू संत सारू काज ये।

जी संत सारू काज ये ।।46।।

* !! दोहा !! *


सदाकाल सम्रथ धणी, रक्षक राम दयाल।

कठिन कली कारण कृपा, हरि बिन कौन संभाल ।।47।।

नमो नमामी नाथ तू, निर्धारां आधार।

लज्जा राखण रामजी, आनंद अगम अपार ।।48।।


प्रसन्न जनां अपवर्ग सुख, शरणै प्रति पालंत।

द्यालबाल शरणागती, क्यों नहिं अरि जालंत ।।49।।


कर्म बड़ा कि हरि बड़ा, यह अचरज मोहि आय।

हृरि तो लेख अलेख है, साधु वचन यों जाय ।।50।।


नारि पलट नर तनु भयो, जन तुरसी के हेत।

अकरण करण दयालु धिन, अपनां को सुख देत ।।51।।


जुग जुग पालत जन पखो, साचा करण सवाल।

सो निर्बल या जगत में, जाके बल गोपाल ।।52।।


राम सदा सुख रंजना, भय भंजन भरतार।

करुणामय कारणकरण, वारक वार न वार ।।53।।


वुहोजात भवसिंधु में, मोहादिक जल पार।

व्याधि ग्राह मोकं गह्यो, अब हरि करण उधार ।।54।।


हूँ सन्ताँ के शरण को, तूं सन्ताँ आधीन।

लायक पायक साँच तव, दीन सहायक दीन ।।55।।


माधोदास दयालु के, प्रसन्न भये धिन राम।

क्यों नहिं वंदत जगत यश, भैरव सेवक ताम ।।56।।


जन नरहरियानंद के, कर दुर्गा आधीन।

नितका ढोया ईधणा, अकरण करण नवीन ।।57।।


चंद्रहास कूं राखियो, केती कष्ट दयाल।

मात आदि चरणां परी, महिपति भक्त विशाल ।।58।।


नंददास के हेत जो, गऊ जिवाई राम।

भये खिसाने विप्र सब, जनके सारे काम ।।59।।


दग्ध देह कमध्वज तणी, किवी पारषद आन।

चारु चलावों शरण सुख, जन महिमा भगवान ।।60।।


हरिपुर से आये जनाँ, पायगये परसाद।

लालाचारज प्रसिद्ध जग, चक्कित रहे असाद ।।61।।


करमांबाई के सदन, भाव मंई परसाद।

नाम लुगाई प्रगट जग, अकरण करण अगाद ।।62।।


कहँलों वरणूं संत जश, गति अगाध परमेश।

मो बल यो ही आसरो, निर्भय गुरु उपदेश ।।63।।


नवग्रह चौंसठ जोगिणी, बावन वीर पर्जन्त।

काल भक्ष सबको करै, हरि शरणै डरपंत ।।64।।


ताकी दासी तापत्रय, मो घट व्याधि जराय।

जानराय जानो सबै, यह विरद केरो जाय ।।65।।

 

तुम पालक सागे सदा, आगे अबै अनंत।

कर्म विडारण तारणा, नमस्कार भगवंत ।।66।।


व्याध एक मार्यों मिरग, व्याल डस्यो तरु छाँय।

तृषा मरत शुक सुनि गिरा, नाम प्रगट उरमाँय ।।67।।


उभय वार श्रवणां सुणे, उभय वार मुख गाय।

अंतकाल ऐसो भयो, ततछिन भए सहाय ।।68।।


जमकिंकर बंधे महा, बंध छुड़ाई ताय।

हरिपुरवासी आयके, लेखै न्याव चुकाय ।।69।।


एके चेळे अध सब,   एके चेळे नाम ।

ऐसीविध भव तारणा, निर्भय दीधो धाम ।।70।।


मेरी विरियां कहा भयो, दीनबंधु दातार।

करहु कृपा अब औरसी, विगरत कौन वुहार ।।71।।


।। सोरठा ।।


उलटा समझे राम औखाणो साचो कर्यों।

शरणागत दुख ताम, यो कारण अबही भयो ।।72।।


आगै अबै न कोय, अजहूँ मैं नाँही सून्यो ।

या तो कदै न होय, रार गमावण रामजी ।।73।।


बोल न जाणूँ कोय, अल्प बुद्दधि मन वेग तें।

नहिं जाके हरि होय, या तो मैं जाणूँ सदा ।।74।।


तव जन शरणै आय, हनूवँश इक डावरो।

नाभा नाम सहाय, चश्मा खुल संजय सही ।।75।।


जन पदपंकज धूर चख उर मन मंजन कर्यों।

राम शब्द भरपूर, ताहि नेत्र ऐसे खुले ।।76।।

 

मुरवेलां सूझंत, अद्भुत वरण्यो ब्रह्म पद।

हरि शरणे जूझत द्यालबाल यह आसरो ।।77।।


पावन पतित अनेक, सम्रथ याही चोज है।

पापी हुलस विशेष, अबकी वेर उबारियो ।।78।।


यह जानत महाराज, शरणागत मेटण अदा।

राम गरीबनिवाज, विघ्नहरण मंगल सदा ।।79।।

 

दोहा


क्ति रैस जामें सकल, छंद सारसी जान।

हरि सरवर हंसा जनां, मुक्ता नाम निधान ।।80।।


भाव नीर निर्मल सदा, परिमल भवसिंधु पार।

रामदास जन रमरह्मा , लह्मा अखै सुख सार ।।81।।


मन कळियो मोह सिंधु में, काळ् ग्राह अघ तंत।

अब लायक सायक सदा, नमस्कार भगवंत ।।82।।


।। छं रोमकंदी ।।

नमो भगवंत सँभारण कारण गत्ति अपारण कोण लही।

भव दुःख विडारण काज सुधारण पार उतारण एक सही।

बल बाँह बधारण अध्य निवारण जीव जिवारण वप्पू धरो।

भव के दुख टार उधार अपंपर पार गरजेंदर जेम करो।

हरि पार गजेन्दर जेम करो ।।83।।


महा मत्त मनंगय रत्त अनंगय अंध कुसंगय मैंमतयूं ।

ता पंच प्रसंगय वाम भुवंगय काम कमंगय से हत यूं।

विष अंग तरंगय ग्रीषम अंगय मोह सुरंगय होय गरो।

भव के दुख टार उधार अपंपर पार गरजेंदर जेम करो।

हरि पार गजेन्दर जेम करो ।।84।।


प्रकृति पचीस तेतीस प्रचंडय मंड स मंडय पिंड इता।

हुय थंड विहंडय जीव से डंडय सूर प्रचंडय मन्न मता।

तत्काल विकराल विहाल स झंपण व्याधि गिराह सनाह बुरो।

भव के दुख टार उधार अपंपर पार गरजेंदर जेम करो।

हरि पार गजेन्दर जेम करो ।।85।।


जग जाल असराल संभाल छले इन भक्ख सदा भवसिंधु मही

नभनाल तंताल धराल मिले त्रयलोक सुरप्पति विद्धि सही।

कई रस्स डढ़ाल ढींचाल उगालण होय अभै खल खाण नरो।

भव के दुख टार उधार अपंपर पार गरजेंदर जेम करो।

हरि पार गजेन्दर जेम करो ।।86।।


जग जंतु जनम्म अनंत कषट्टय महा दुषट्टय ह्वाल हुआ।

जिव अध्य करष्षय मृत्यु हरष्षय पूर वरष्य आयु दुआ।

अंत नाड़ि तटक्कय प्राण सटक्कय छोड़ि घटक्कय सीर टरो।

भव के दुख टार उधार अपंपर पार गरजेंदर जेम करो।

हरि पार गजेन्दर जेम करो ।।87।।


इम श्वास दमोदम दुःख हमोहम राम रमोरम जान सवे।

ग्रह ग्राह गमोगम जीव भमोभम एक तमोतम और न वे।

यह दीनसमो शम क्यों न करो कम राज नमो नम धीर धरो।

भव के दुख टार उधार अपंपर पार गरजेंदर जेम करो।

हरि पार गजेन्दर जेम करो ।।88।।


परिवार न वारण सार संभारण तारण कारण आय लियो

आरोह खगारण धाय धरारण चक्र चलारण काज कियो।

धिन आप अपारण सोई विचारण टेर उचारण एक ररो।

भव के दुख टार उधार अपंपर पार गरजेंदर जेम करो।

हरि पार गजेन्दर जेम करो ।।89।।


गोविन्द आनन्द नमो चन्दवन्द पुरंद सुखंद समंद सदा ।

मो मंद मनंद गमो सिध तद्द लयंद सयंद उरंद मुदा।

हद जिंद निकंद सकंद सदोगति अंद समंद दुरंद हरो।

भव के दुख टार उधार अपंपर पार गरजेंदर जेम करो।

हरि पार गजेन्दर जेम करो ।।90।।


।। छंद् छप्पय ।।


दव्दं हरण गोविन्द तरण भवसिंधु विश्वंभर ।

नमस्कार आधार भूल नहिं परत निशंभर।

ग्राह दुखाह अथाह अबै शरणागति तेरी।

दीनबंध आनंद टेर यह सुनिये मेरी।

निराधार आधार हरि पारवार पावन पतित।

द्यालबाल शरणागती करी सरी सो मुनि कथित ।।91।।


।। दोहा ।।


नाँहिन दूजो आसरो, यह दुख मेटण आप ।

दाझत जग माया दुखद, तीनलोक त्रयताप ।।92।।

 

।। छंद रोमकंदी ।।

 

त्रय ताप संताप दुखाप दुखंकर पाप कियंकर लार लगा

जिय छाप कलाप विलाप भयंकर बाफ हुतंकर मृत्यु अगा।

मन साँप शराप विशेष कायापर मोह मया धर वेश तरै।

मनतें सिध सार अधार रमारम आप विनां कुण ताप हरे।

जी आप बिनां कुण ताप हरै ।।93।।


अंतकाल अकाल भुताल स डाकण मूठस नांखण प्राण लिया।

कुवै खाल जुराल खोगाल फसावण मारग जावण मार बिया।

अधिभूत जरावण तामस खावण औरन आवण जोणि धरै।

मनतें सिध सार अधार रमारम आप विनां कुण ताप हरे।

जी आप बिनां कुण ताप हरै ।।94।।

 

ज्वर व्याधि असाध्य नारू तन दुखण डैरु सहूकण रोग किता ।

कफजादि रजादि फियादि स सूकण वायु गठूखण भोग जिता ।

यह जासु रजागुण दाझ अध्यातम लाज प्रमातम काज करे।

मनतें सिध सार अधार रमारम आप विनां कुण ताप हरे।

जी आप बिनां कुण ताप हरै ।।95।।


वयाल सियाल उनाल वयाकूल वारि वर्षाल खुधाल सयूं।

वन्नाल विचाल गिराल असाकल ज्वाल मयाल सखाल लयूं

सुराल विचाल झपट्ट सतोगुण यह अधिदैव से बाल टरै।

मनतें सिध सार अधार रमारम आप विनां कुण ताप हरे।

जी आप बिनां कुण ताप हरै ।।96।।


क्रियमान मिलान भोगान संचित्तय प्राणि वसान सुथान जका।

तपतीन विधान समान दसत्तिय मान अज्ञान सुजान धका।

तब आन अचानक हानि करे जिव बानक इक भगवान सरै।

मनतें सिध सार अधार रमारम आप विनां कुण ताप हरे।

जी आप बिनां कुण ताप हरै ।।97।।


उर चाय उपाय भमाय सबै घट लाय अथाय जलाय दिया।

मुरझाय दिखाय जमाय तबै शठ ताय बंधाय धकाय लिया।

कइ खाय सिराय पचाय जठागनि दाय सहाय सवाय मरै।

मनतें सिध सार अधार रमारम आप विनां कुण ताप हरे।

जी आप बिनां कुण ताप हरै ।।98।।


गुरु ज्ञान घटा वरसान सदा संग दुरि अदा उन प्राणि मिटे।

उर आन मिटा हरि ध्यान सदा रँग नूर तदा तनु जान हटे।

उर जाल सेवाल मिटाय के उज्वल प्रेम सुखाल अमिट्ट झरे।

मनतें सिध सार अधार रमारम आप विनां कुण ताप हरे।

जी आप बिनां कुण ताप हरै ।।99।।


दयाल कृपाल संभाल करै जिव झाल कराल विचाल रखे।

जठराल उधाल खुधाल मरे नभ नाभि नभाल रसाल भखे।

जनमाल धुराल दुधाल सिरज्जत कालमें क्यों न गवाल करै।

मनतें सिध सार अधार रमारम आप विनां कुण ताप हरे।

जी आप बिनां कुण ताप हरै ।।100।।

 

।। छंद छप्पय ।।


काल दुकाल सँभाल करै करुणा के सागर।

झाल असराल त्रिकाल टरै हरि जासु कृपा कर।

जन्मांजन्म अनंत कहा वरणत दुख जीवस।

अब सहायक महाराज राज तारण धिन पीवस।

राम इन्द हरिजन घटा यह वर्षा अब कीजियै।

द्यालबाल शरणागती अपनो करिके लीजियै ।।101।।

!! इति श्री ग्रंथ करूणासागर सम्पूर्णम् !!



करुणासागर ग्रंथ क्या है ? 

 

 अथ ब्रह्म स्तुतीं


अथ रक्षा बत्तीसी


ग्रंथ अरदास बत्तीसी


श्री गुरु वन्दन स्तोत्र


सन्ध्या वन्दन (आरती)


रामस्नेही संप्रदाय खेड़ापा के आचार्य।रामस्नेही संप्रदाय खेड़ापा के महाराज।रामस्नेही संप्रदाय खेड़ापा के गुरु।

 

ग्रन्थ करुणा सागर


श्री हनुमान चालीसा – Shree Hanuman Chalisa


भोजन मंत्र – Bhojan Mantra

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